Friday, October 10, 2008

काश ! इसे कोई समझाता !!


जीवन में है कितने बंधन
अब तक इसको समझ न पाया
मन करता रहता है क्रंदन
फिर भी है उसको अपनाया ।
द्वंद भरा यह कैसा जीवन
कभी हसता , कभी रुलाता
सब अपने है समझ न पाता
समझ अकेला मन अकुलाता ।
सारे बंधन मेरे अपने
बढ़ते जाते है क्यू सपने
दिवा स्वप्न अब थका रहे है
समय चल दिया बाती ढकने ।
कब यह बाती बुझ जायेगी
कब तक यह मन बहलायेगी
काश ! इसे कोई समझाता
मेरे मन को राह देखता ।

(This poem has been written by my father.
I Love this poem. Hope u will also love and like it )

9 comments:

श्यामल सुमन said...

देव जी,

आपके पिताजी द्वारा लिखित यह कविता भावपूर्ण है। विनोद सरोज की पंक्तियों के माध्यम से कहना चाहता हूँ कि -

आओ मिलकर एक नयी शुरुआत करें।
भूलें कल को और आज की बात करें।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

फ़िरदौस ख़ान said...

बहुत अच्छी रचना है...बधाई...

makrand said...

baut sunder kavita
bavapurna
regards

excavator parts said...

what happened to the other one?

Vishavjeet Singh said...

हर कदम पर ज़िन्दगी को बस परखते जाइये।
कभी अकेले, तो कभी कारवां के साथ चलते जाइये॥
ज़िन्दगी को समझ लेना, तो बड़ा मुश्किल है दोस्त।
हो सके तो सुख और दुःख में एक होते जाइये॥

Renu Sharma said...

dev ji , bahut achchha likha hai aapke pitaji ne ,, shukriya

Sachin Malhotra said...

u have a nice blog
pls make a visit on my blog...
http://shayrionline.blogspot.com/

thank you

Restless soul said...

Khoobsurat.......

Mann ki vyathaaoo ki koi seema nahi...lekin asli vyatha jo sab vyathaoon ka nichod hai .....apne aap se soonapan..akelapan...Khud se khud ki talash.

issi vyathaa ki jhalak mujhe mili hai.....

Dhanyawad

Rashi said...

beautiful poems. very very very nice. all are so nice. please also visit my poems at my blog - http://www.creations-to-be.blogspot.com/

thanks, rashi